
उज्जैन। वैकुंठ चतुर्दशी के पावन पर्व पर 4 नवंबर 2025 को उज्जैन में महाकाल मंदिर के गर्भगृह में भस्मारती के वक्त हरि (भगवान विष्णु) और हर (भगवान शिव) के मिलन का अद्भुत और अनूठा उत्सव मनाया गया। यह परंपरा महाकाल मंदिर और गोपाल मंदिर दोनों जगह निभाई गई, जो साल में केवल एक बार होती है।
सोमवार तड़के भस्म आरती से पहले महाकाल मंदिर में हरिहर मिलन का आयोजन किया गया।
- श्री हरि का आगमन: भगवान श्री विष्णु की प्राचीन प्रतिमा को मंदिर के पूजन घर से पुजारीगण गर्भगृह तक लेकर आए। उनके साथ लड्डू गोपाल और मां लक्ष्मी की प्रतिमा भी गर्भगृह में लाई गई।
- परंपरा: साल में सिर्फ एक बार भगवान विष्णु को भस्म आरती के लिए गर्भगृह तक लाया जाता है।
- अगवानी: गर्भगृह के द्वार पर भगवान महाकाल की ओर से पुजारियों ने श्री हरि की अगवानी की। इस दौरान भगवान महाकाल ने तुलसी माला धारण की और उन्हें वैष्णव तिलक लगाया गया।
- पूजन: बाद में दोनों देवताओं को एक साथ विराजित कर भस्म आरती की गई। भगवान विष्णु को भगवान शिव की प्रिय बिल्वपत्र की माला अर्पित कर भोग लगाया गया।
रात 12 बजे गोपाल मंदिर में सत्ता परिवर्तन
वैकुंठ चतुर्दशी की रात में गोपाल मंदिर में हरिहर मिलन का भव्य समारोह आयोजित हुआ, जिसे मुख्य रूप से सत्ता परिवर्तन के रूप में मनाया जाता है।
- महाकाल की सवारी: सोमवार 3 नवंबर 2025 की रात 11 बजे, भगवान महाकाल लाव-लश्कर (सवारी) के साथ गोपाल मंदिर के लिए निकले। सवारी गुदरी बाजार और पटनी बाजार होते हुए गोपाल मंदिर पहुंची।
- मिलन समारोह: गोपाल मंदिर और महाकाल मंदिर के पुजारियों ने मंत्रोच्चार के बीच भगवान शिव और भगवान विष्णु का मिलन कराया।
- सत्ता हस्तांतरण: चातुर्मास समाप्त होने के बाद, भगवान महाकाल ने संपूर्ण सृष्टि की सत्ता पुन: भगवान विष्णु को सौंपी। इस दौरान, भगवान शिव की बेलपत्र की माला भगवान विष्णु को और भगवान विष्णु की तुलसी की माला भगवान महाकाल को पहनाकर सत्ता का औपचारिक परिवर्तन किया गया।
- भोग: परंपरा के अनुसार, इस अवसर पर दोनों ही देवताओं को एक-दूसरे की प्रिय वस्तुओं का भोग लगाया गया।
ऐतिहासिक परंपरा: उज्जैन में हरिहर मिलन की यह परंपरा पिछले 116 साल (1909) से समारोहपूर्वक निभाई जा रही है।
देवशयनी से देवउठनी तक की मान्यता
पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बली के यहां विश्राम करने जाते हैं। इस अवधि में संपूर्ण सृष्टि की सत्ता का भार भगवान शिव संभालते हैं। वैकुंठ चतुर्दशी पर भगवान महाकाल, गोपाल मंदिर पहुंचकर यह भार पुन: भगवान विष्णु को सौंप देते हैं।



