
उज्जैन। एक ओर सरकार सिंहस्थ-2028 में 30 करोड़ लोगों के आगमन और उज्जैन को ‘मेट्रो सिटी’ बनाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर मोक्षदायिनी शिप्रा नदी की स्थिति फिलहाल दयनीय बनी हुई है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के संयुक्त जांच दल ने उज्जैन के विभिन्न घाटों का दौरा कर नदी की बदहाली का आंखों देखा हाल दर्ज किया है। इस मामले की अगली सुनवाई भोपाल स्थित एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच में 10 मार्च 2026 को होनी है।
फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी से जुटाई हकीकत
शिप्रा की दुर्दशा को लेकर रमेशचंद्र द्विवेदी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने एक संयुक्त प्रशासनिक दल का गठन किया था। इस दल में निम्नलिखित विशेषज्ञ शामिल थे:
-
डॉ. अनूप चतुर्वेदी: वैज्ञानिक, सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (भोपाल)।
-
राजशेखर रेड्डी: मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरनमेंट एंड फॉरेस्ट (रीजनल ऑफिस)।
-
डॉ. मनोज विश्वकर्मा: सहायक साइंटिफिक ऑफिसर (एप्को, भोपाल)।
जांच दल ने पिछले दिनों दिनभर शिप्रा नदी के अलग-अलग पॉइंट पर पहुंचकर मौजूदा स्थिति का जायजा लिया और एक-एक हिस्से की वीडियोग्राफी करवाई।
जांच में हुए चौंकाने वाले खुलासे: “पेड़ों का कत्लेआम और सीवर का जहर”
संयुक्त जांच दल को निरीक्षण के दौरान शिप्रा किनारे कई गंभीर अनियमितताएं मिलीं:
-
पुराने पेड़ों की कटाई: गंगा घाट के पास 50 साल से भी अधिक पुराने और छायादार पेड़ों को मशीनों से काटते हुए पाया गया।
-
सीवर का मिलन: वाल्मीकि धाम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव और मंगलनाथ मंदिर के पीछे से सीवरेज का गंदा पानी सीधे नदी में मिलता दिखा।
-
केमिकल युक्त पानी: भैरवगढ़ क्षेत्र में दिल्ली दरवाजे के समीप प्रिंटिंग कारखानों का दूषित और जहरीला पानी नदी में गिर रहा है।
-
रिटेनिंग वॉल का खतरा: शिप्रा पर बन रहे 29 किमी लंबे घाट और 7 फीट ऊंची रिटेनिंग वॉल (सुरक्षा दीवार) का भी दल ने आकलन किया। विशेषज्ञों को डर है कि बारिश के दिनों में यह दीवारें नदी के प्राकृतिक बहाव को नुकसान पहुँचा सकती हैं।
प्रशासन का पक्ष: रिपोर्ट सीधे एनजीटी को सौंपी जाएगी
अपर कलेक्टर शाश्वत शर्मा ने पुष्टि की कि एनजीटी द्वारा गठित टीम ने मौका मुआयना कर लिया है। टीम ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर ली है, जिसे सीधे एनजीटी में सबमिट किया जाएगा। यह रिपोर्ट 10 मार्च की सुनवाई में सबसे महत्वपूर्ण आधार बनेगी।
सिंहस्थ 2028 और शिप्रा: बड़ी चुनौतियां
-
घाटों की स्थिति: राम घाट, नृसिंह घाट, गऊ घाट और त्रिवेणी घाट पर पानी की गुणवत्ता मानक स्तर से काफी नीचे है।
-
कानूनी पेच: यदि एनजीटी की रिपोर्ट नकारात्मक रही, तो शिप्रा किनारे चल रहे करोड़ों रुपये के घाट निर्माण कार्यों पर रोक लग सकती है या प्रशासन पर भारी जुर्माना लग सकता है।
शिप्रा के ‘जख्म’: ये हैं वो प्रमुख नाले जो नदी में घोल रहे हैं जहर
एनजीटी (NGT) की टीम ने अपनी जांच में पाया है कि शिप्रा को स्वच्छ बनाने के तमाम प्रशासनिक दावों के बावजूद, कई बड़े नाले और औद्योगिक इकाइयां आज भी निर्बाध रूप से गंदगी नदी में बहा रही हैं। यहाँ उन प्रमुख नालों और प्रदूषण केंद्रों की सूची है जो शिप्रा के अस्तित्व के लिए खतरा बने हुए हैं:
1. गंदा नाला (रुद्रसागर क्षेत्र)
यह उज्जैन शहर का सबसे बड़ा और विवादित नाला है। सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के दावों के बावजूद, अक्सर बारिश और तकनीकी खराबी के दौरान इसका गंदा पानी सीधे रामघाट के समीप शिप्रा में मिल जाता है।
2. भैरवगढ़ नाला (औद्योगिक कचरा)
भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित प्रिंटिंग कारखानों (Bhairavgarh Print) का केमिकल युक्त रंगीन पानी इस नाले के जरिए सीधे शिप्रा में मिलता है। एनजीटी की टीम ने दिल्ली दरवाजे के पास इसकी भयावह स्थिति को रिकॉर्ड किया है।
3. मंगलनाथ और वाल्मीकि धाम क्षेत्र के नाले
इन क्षेत्रों में सीवरेज लाइन चोक होने या अधूरी होने के कारण आसपास की बस्तियों का मल-मूत्र सीधे नदी में गिर रहा है। पवित्र मंगलनाथ मंदिर के ठीक पीछे से बहने वाली गंदगी श्रद्धालुओं की आस्था को गहरी चोट पहुँचाती है।
4. ऋणमुक्तेश्वर और चक्रतीर्थ नाला
शमशान घाट (चक्रतीर्थ) और ऋणमुक्तेश्वर मंदिर के समीप छोटे-बड़े कई नाले नदी में मिल रहे हैं। यहां पानी का रंग काला पड़ चुका है और दुर्गंध के कारण आचमन करना भी दूभर है।
5. त्रिवेणी संगम पर मिल रहा खान नदी का प्रदूषण
शिप्रा की सबसे बड़ी समस्या ‘खान नदी’ है। इंदौर से आने वाली यह नदी पूरी तरह प्रदूषित है। हालांकि इसके लिए कान्ह क्लोज डक्ट (Kanh Close Duct) परियोजना बनाई गई है, लेकिन रिसाव के कारण अक्सर खान का जहरीला पानी त्रिवेणी संगम पर शिप्रा में मिल जाता है।
एनजीटी की रिपोर्ट के बाद क्या बदल सकता है?
-
जुर्माना: यदि 10 मार्च 2026 की सुनवाई में प्रशासन प्रदूषण रोकने में विफल पाया जाता है, तो नगर निगम और संबंधित विभागों पर भारी जुर्माना लग सकता है।
-
निर्माण कार्यों पर रोक: घाटों पर हो रहे कंक्रीटीकरण और पेड़ों की अवैध कटाई पर एनजीटी तत्काल रोक लगा सकती है।
-
अधिकारियों पर गाज: प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ढुलमुल रवैये पर भी एनजीटी सख्त टिप्पणी कर सकती है।
सिंहस्थ के नाम पर हो रहा निर्माण कार्य कहीं पुण्यसलिला शिप्रा के अस्तित्व के लिए खतरा न बन जाए। कंक्रीट के घाट बनाने से पहले नदी में मिल रहे ‘गंदे नाले’ और ‘फैक्ट्री के केमिकल’ को रोकना ही असली समाधान होगा। जब तक इन नालों का स्थायी समाधान (पूर्णतः डाइवर्जन) नहीं होगा, तब तक करोड़ों रुपये खर्च करके बनाए जा रहे पक्के घाट केवल दिखावा साबित होंगे।



