अध्यात्मउज्जैनदेश-दुनिया

ऐतिहासिक महाकाल द्वार ढह गया-दीवारें बयां कर रही मनमानी की दास्तां

महाकाल के पास सड़क के लिए 7 मीटर गहरी खुदाई के दौरान हादसा, सिंहस्थ तैयारियों पर उठे सवाल

उज्जैन बाबा महाकाल के मंदिर से महज 100 मीटर की दूरी पर स्थित 14वीं शताब्दी का ऐतिहासिक महाकाल द्वार शनिवार 5 सितंबर 2026  देर रात भरभराकर ढह गया। सिंहस्थ की तैयारियों के मद्देनजर 15 करोड़ रुपये की लागत से बनाई जा रही नई सड़क के लिए द्वार के ठीक पास 7 मीटर गहरी खुदाई कर दी गई थी। लगातार दो दिनों से हो रही भारी बारिश के कारण मिट्टी धंस गई और यह अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर चंद मिनटों में मलबे के ढेर में तब्दील हो गई। गनीमत यह रही कि इस भीषण हादसे में किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई, लेकिन प्रशासन की कार्यप्रणाली और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विकास के नाम पर प्राचीन धरोहरों के साथ जिस तरह मनमानी हो रही है उसकी दास्तां भी महाकाल द्वार की दीवारें बयां कर रही हैं।

 कैसे ढहा सदियों पुराना गौरव?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, श्री महाकालेश्वर मंदिर से लगभग सौ मीटर दूर हेरिटेज विक्रमादित्य होटल के सामने यह प्राचीन महाकाल द्वार स्थापित था। इस द्वार का निर्माण 14वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभिक काल का माना जाता था। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को देखते हुए उज्जैन स्मार्ट सिटी कंपनी ने ‘मृदा प्रोजेक्ट’ के अंतर्गत करीब 2.12 करोड़ रुपये की लागत से इसका भव्य जीर्णोद्धार करवाया था और इसे एक प्रमुख हेरिटेज स्थल के रूप में विकसित किया था

वर्तमान में आगामी सिंहस्थ महाकुंभ को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में विकास कार्यों को गति दी जा रही है। इसी कड़ी में द्वार के बिल्कुल नजदीक नए मार्ग का निर्माण किया जा रहा है। इस सड़क मार्ग के निर्माण के लिए लगभग 7 मीटर की अत्यधिक गहराई तक मिट्टी की खुदाई कर दी गई थी। पिछले दो दिनों से शहर में हो रही लगातार मूसलाधार बारिश के कारण मिट्टी की पकड़ कमजोर हो गई और वह अंदर की ओर खिसक गई। मिट्टी के धंसने से इस प्राचीन संरचना का संतुलन बिगड़ गया और शनिवार देर रात यह ऐतिहासिक द्वार ताश के पत्तों की तरह ढह गया

ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा में लापरवाही

इस हादसे के बाद विकास कार्यों के दौरान बरती जाने वाली आवश्यक सावधानियों और सुरक्षा इंतजामों को लेकर तीखी आलोचना शुरू हो गई है। स्थानीय नागरिकों और विशेषज्ञों का कहना है कि प्राचीन और संवेदनशील धरोहरों के समीप जब भी भारी मशीनों से खुदाई या निर्माण कार्य किया जाता है, तो अत्यंत सावधानी बरतनी पड़ती है। इस मामले में चर्चा रही कि नजदीक मार्ग निर्माण के दौरान द्वार की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त तकनीकी एहतियात नहीं बरती गई। मिट्टी न खिसके, इसके लिए आवश्यक और मजबूत ‘शोरिंग’ या सपोर्ट सिस्टम नहीं लगाए गए थे

हालांकि, तकनीकी विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों ने इस बात से इनकार किया है कि काम में कोई गंभीर लापरवाही बरती गई थी। स्मार्ट सिटी के प्रभारी कार्यपालन यंत्री कमलकांत सक्सेना ने मीडिया से बातचीत में बताया कि घटना के कारणों की विस्तृत और निष्पक्ष जांच के आदेश दे दिए गए हैं। प्रथम दृष्टया लगातार दो दिनों तक हुई बारिश के कारण मिट्टी के सेटल होने और जलभराव से यह दुर्घटना सामने आई है। उनका दावा था कि फील्ड पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए गए थे और आसपास की आवाजाही को भी नियंत्रित किया गया था

रामघाट से महाकाल आने का ऐतिहासिक और पौराणिक मार्ग

उज्जैन स्मार्ट सिटी कंपनी द्वारा इस स्थल पर लगाए गए शिलालेख में इस प्राचीन मार्ग के गौरवशाली इतिहास का विस्तार से उल्लेख किया गया है। शिलालेख के अनुसार, श्री महाकालेश्वर मंदिर के उत्तर में स्थित इस धरोहर को महाकाल द्वार के नाम से जाना जाता था। इस ऐतिहासिक प्रवेश द्वार का निर्माण संभवतः 14वीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ था। इसका निर्माण मुख्य रूप से बेसाल्ट पत्थर तथा ईंट की मजबूत चिनाई से किया गया था

महाकाल द्वार के अंदर का नजारा
महाकाल द्वार के अंदर का नजारा

द्वार की वास्तुकला में विशाल मेहराव, पारंपरिक पत्थर की सीढ़ियां, सुंदर अलंकृत अभिप्रायों के साथ लघुकृत देवकुलिकाएं और एक प्राचीन मार्ग विद्यमान था। प्राचीन काल से ही यह महाकाल द्वार क्षिप्रा नदी के रामघाट से श्री महाकालेश्वर मंदिर तक आने-जाने का अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग रहा है, जिसका उपयोग सदियों से स्थानीय नागरिकों, संतों और दूर-दूर से आने वाले तीर्थयात्री करते आए हैं। इसकी स्थापत्य कला इस बात की गवाही देती है कि मध्यकाल में दिल्ली के तीसरे सुल्तान इल्तुतमिश द्वारा इस क्षेत्र में हुए विनाश के बाद विभिन्न राजवंशों, विशेषकर 18वीं शताब्दी में सिंधिया राजवंश और तत्पश्चात 2004 के सिंहस्थ कुंभ के दौरान इसका पुनर्विकास और रखरखाव किया गया था

महाकाल द्वार का ऐतिहासिक कालखंड और विकास का क्रम

कालखंड / राजवंश ऐतिहासिक गतिविधि / योगदान
14वीं शताब्दी ईस्वी

प्रारंभिक निर्माण, बेसाल्ट पत्थर और ईंटों से महाकाल द्वार की स्थापना

मध्यकाल (इल्तुतमिश काल पश्चात)

विनाश के बाद विभिन्न राजवंशों द्वारा पुनर्निर्माण व रखरखाव के प्रयास

18वीं शताब्दी

सिंधिया राजवंश द्वारा स्थल का पुनर्विकास एवं जीर्णोद्धार

सिंहस्थ 2004

महाकुंभ के दौरान तीर्थयात्रियों की सुविधा हेतु जीर्णोद्धार व सौंदर्यीकरण

वर्ष 2021 (स्मार्ट सिटी)

मृदा योजना अंतर्गत 2.12 करोड़ से पारंपरिक सामग्री (चूना, गुड़, मेथी आदि) द्वारा जीर्णोद्धार

पारंपरिक तकनीकों से हुआ था वर्ष 2021 में जीर्णोद्धार

देखरेख के अभाव में एक समय यह प्राचीन द्वार और उससे जुड़ी सीढ़ियां अत्यंत खस्ताहाल स्थिति में पहुंच चुकी थीं। इसके बाद उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने ‘मृदा योजना’ के अंतर्गत इसकी सुध ली और लगभग 2.12 करोड़ रुपये की लागत से इस द्वार एवं सीढ़ियों वाले प्राचीन मार्ग का पुनरुद्धार कराया। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसके प्राचीन और मौलिक स्वरूप को कायम रखने के लिए आधुनिक सीमेंट या कंक्रीट का उपयोग बिल्कुल नहीं किया गया था

इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए प्राचीन भारतीय स्थापत्य पद्धतियों का अनुसरण किया गया था। जीर्णोद्धार कार्य में चूना, गुड़, मेथी, गूगल, और उड़द के पानी जैसे पारंपरिक और प्राकृतिक मिश्रणों का उपयोग किया गया था। इस विशिष्ट और कठिन कार्य को अंजाम देने के लिए चंदेरी और ललितपुर से विशेष और पारंपरिक कारीगरों को बुलवाया गया था। उस समय इन कुशल कारीगरों ने यह दावा भी किया था कि जहां आज के साधारण सीमेंट से किए गए निर्माण की उम्र बमुश्किल 50 से 100 वर्ष होती है, वहीं इस प्राचीन पारंपरिक चूने-गुड़ की पद्धति से किए गए निर्माण की उम्र 1000 वर्ष से भी अधिक होती है

महाकाल द्वार अब यह अवशेष बचे

15 करोड़ की नई सड़क परियोजना 

वर्तमान में उज्जैन स्मार्ट सिटी द्वारा भारत माता मंदिर के सामने से पुराने महाकाल थाने होते हुए चौबीस खंबा माता मंदिर के घाटी मार्ग तक एक नए आधुनिक सड़क मार्ग का निर्माण किया जा रहा है। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की कुल लागत करीब 15 करोड़ रुपये है। यह नया मार्ग महाकाल द्वार के नजदीक से होते हुए गुजरना था, जिसके कारण ही द्वार के पास भारी पैमाने पर कटाई और गहरी खुदाई की गई

घटना के तुरंत बाद जिला प्रशासन और उज्जैन विकास प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे। इस बार भी प्रशासन ने एक उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। हालांकि, सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों रुपए खर्च करके किसी प्राचीन धरोहर को संवारा जाता है, तो उसके आसपास भारी निर्माण कार्यों के दौरान उसकी सुरक्षा के लिए पुख्ता वैज्ञानिक और तकनीकी उपाय पहले क्यों नहीं किए जाते? क्या मात्र जांच समितियों के गठन से सदियों पुरानी उस विरासत को वापस लाया जा सकता है जो लापरवाही की भेंट चढ़ गई?

पुरातात्विक विशेषज्ञों की सलाह को अनिवार्य बनाए

महाकाल द्वार का इस तरह अचानक भरभराकर गिरना शहर के इतिहास प्रेमियों और बुद्धिजीवियों के लिए एक बहुत बड़ा आघात है। सिंहस्थ जैसे विशाल आयोजनों के लिए शहर का विकास आवश्यक है, लेकिन विकास की अंधी दौड़ में अपनी अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर खो देना एक अपूरणीय क्षति है। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन भविष्य में ऐसी विकास परियोजनाओं को क्रियान्वित करते समय पुरातात्विक विशेषज्ञों की सलाह को अनिवार्य बनाए और हर हेरिटेज साइट के चारों ओर एक सुरक्षा बफर जोन सुनिश्चित करे

-हरिओम राय @ उज्जैन

महाकाल की नगरी का ‘महानगर’ अवतार: उज्जैन बनेगा देश का मॉडल मेट्रो सिटी

Related Articles

Back to top button