मोहन भागवत बोले – सरकार बदलने से हालात नहीं बदलते
संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर में विजयादशमी उत्सव मेें की देश को सतर्क रहने की अपील
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने मंगलवार 20 अक्टूबर 2026 को नागपुर स्थित अपने मुख्यालय में पूरे हर्षोल्लास के साथ अपना पारंपरिक विजयादशमी उत्सव और स्थापना दिवस मनाया। वर्ष 1925 में इसी पावन दिन (विजयादशमी) पर संघ की स्थापना हुई थी। इस विशेष अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पारंपरिक विधि-विधान से शस्त्र पूजन किया और देश को संबोधित करते हुए कई गंभीर मुद्दों पर बेबाक राय रखी।
अपने संबोधन के दौरान संघ प्रमुख ने देश और दुनिया के वर्तमान हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि भारत को अस्थिर करने और यहां की सत्ता बदलकर अपने पिट्ठू बैठाने के लिए विदेशी और असुरी ताकतें सक्रिय हो चुकी हैं। उन्होंने देशवासियों से पूरी तरह सतर्क और एकजुट रहने का आह्वान किया।
नागपुर के संघ मुख्यालय में आयोजित इस गरिमामय विजयादशमी उत्सव में देश-विदेश की कई जानी-मानी हस्तियां शामिल हुईं। कार्यक्रम में मुख्य रूप से:
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पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और उनकी पत्नी डॉ. सुदेश धनखड़,
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इजराइल के काउंसल जनरल यानिव रेवाच (Yaniv Revach),
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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, और
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केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी उपस्थित रहे।
फ्रांस और बांग्लादेश जैसे हालात बनाने की साजिश: मोहन भागवत
संघ प्रमुख ने दुनिया के कई देशों में हाल ही में मचे सियासी उथल-पुथल का जिक्र करते हुए भारत को आगाह किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम से एक ऐसी आंधी चली है जो हर प्राचीन संस्कृति का विरोध करती है और उसे नष्ट करना चाहती है।
मोहन भागवत के शब्द: “फ्रांस में क्या हो रहा है, नेपाल और बांग्लादेश में क्या हुआ, यह सब हमारे सामने है। कुछ लोग कहते हैं कि रिजीम चेंज (सरकार बदलने) से हालात बदल जाएंगे, लेकिन इतिहास गवाह है कि न तो ऐसा पहले कभी हुआ है और न ही आगे होगा। आज भारत में भी फ्रांस और बांग्लादेश जैसे हालात बनाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। दुनिया में कुछ ऐसी ताकतें हैं जो भारत की बढ़ती ताकत को दबाना चाहती हैं।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि इन ताकतों का मकसद केवल सरकार या सत्ता बदलना भर है, ताकि वे देश में अपने इशारों पर नाचने वाले ‘पिट्ठू’ नेताओं को स्थापित कर सकें। दुर्भाग्यवश, देश के भीतर भी कुछ लोग और नेता अनजाने या जानबूझकर ऐसी ताकतों की मदद कर रहे हैं।
भाषण के जरिए भागवत का देश को संदेश
आंदोलन का मकसद समाधान हो, विभाजन नहीं
समस्याओं के कारण समाज में आंदोलन होना स्वाभाविक है, लेकिन आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य किसी समस्या का ठोस ‘समाधान’ होना चाहिए, न कि समाज में द्वेष, कलह और विभाजन पैदा करना। कई बार आंदोलनों का इस्तेमाल राजनीतिक स्वार्थ और विरोध भड़काने के लिए किया जाता है। देश और समाज को सिर्फ नेता नहीं चलाते, बल्कि समाज की अपनी सक्रियता से समस्याओं का असली समाधान निकलता है।
एकता के सूत्र में बंधे रहना सबसे बड़ी ढाल
इतिहास का हवाला देते हुए भागवत ने कहा कि लॉर्ड कर्जन ने हिंदू-मुस्लिम के आधार पर बंगाल का विभाजन किया था, जिसे जनता के विरोध के कारण चार साल बाद वापस लेना पड़ा था। लेकिन 1947 में देश का विभाजन नहीं रोका जा सका, क्योंकि लोगों के मन में यह विचार घर कर गया था कि “जो अलग दिखते हैं, वे अलग ही हैं।” तुष्टिकरण की राजनीति ने हमेशा समाज को तोड़ने वाली मानसिकता को बढ़ावा दिया है। यदि हम सब एकता के सूत्र में बंधे रहेंगे, तो कोई भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
पूर्वज एक, सबको साथ लेकर चलना जरूरी
हम सभी भारतवासियों के पूर्वज एक हैं और हमारी साझा संस्कृति का मूल भी एक ही है। किसी की भी व्यक्तिगत या सांस्कृतिक पहचान को मिटाए बिना सबको साथ लेकर चलना ही सच्चा राष्ट्रधर्म है। भारतीय परंपरा और दर्शन में आज भी दुनिया भर की तमाम समस्याओं का अचूक समाधान देने की असीम क्षमता है।
विकास ऐसा हो जो इकोनॉमी, इकोलॉजी और एथिक्स का रखे ध्यान
नेपाल का उदाहरण देते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि देश के विकास के लिए आधुनिक तकनीक और विज्ञान को बढ़ावा देना जरूरी है, लेकिन इसके चक्कर में प्रकृति (पर्यावरण) को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें अर्थव्यवस्था (Economy), पर्यावरण (Ecology) और नैतिकता (Ethics) तीनों का संतुलन बना रहे।
तकनीक और ओटीटी (OTT) पर नियंत्रण जरूरी
आज सूचनाओं का अंबार है और हर व्यक्ति के हाथ में तकनीक है। लेकिन बिना विवेक के किसी भी जानकारी या टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने से भारी नुकसान हो सकता है। विशेष रूप से आज के दौर में OTT प्लेटफॉर्म्स पर कड़े नियम होने चाहिए, जिस पर सरकार और प्रशासन को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल भी बेहद संभलकर और सकारात्मक दिशा में किया जाना चाहिए।
छोटे-छोटे अहंकार त्यागें, राष्ट्रहित सर्वोपरि
अपने संबोधन के अंत में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपील की कि देशवासियों को अपने छोटे-छोटे अहंकार, मतभेद और आपसी विवादों को भूलकर केवल देश के हित में जीना चाहिए। उन्होंने कहा कि सबको आपस में जोड़ने और एकसाथ ऊपर उठाने वाले मूल तत्व का नाम ही ‘धर्म’ है। हमें इसी धर्म-तत्व को आधार बनाकर एक सशक्त, आत्मनिर्भर और दुनिया के सामने मिसाल पेश करने वाले ‘नए भारत’ का निर्माण करना है।



