कालिदास अकादमी में प्रशासनिक संकट, समारोह में चंद दिन शेष
कालिदास अकादमी में रिटायरमेंट के बाद भी जमे हैं पूर्व डायरेक्टर

विश्वविख्यात अखिल भारतीय कालिदास समारोह की उल्टी गिनती शुरू (21 नवंबर से शुभारंभ), लेकिन मुख्य आयोजक संस्था ‘कालिदास अकादमी’ में पिछले एक महीने से निदेशक का पद खाली है। पूर्व निदेशक डॉ. गोविंद गंधे का 3 साल का कार्यकाल 5 अक्टूबर को पूरा होने के बाद रिटायरमेंट हो चुका है, इसके बावजूद वे दफ्तर पहुंचकर कुर्सी पर बैठ रहे हैं। समारोह के संस्थापक पं. सूर्यनारायण व्यास के पुत्र राजशेखर व्यास ने इसे ‘शर्मनाक’ बताया है और अकादमी के अस्तित्व पर संकट की आशंका जताई है।
उज्जैन। अपनी वैश्विक ख्याति और महाकवि कालिदास की पावन साधना स्थली के रूप में पहचाने जाने वाले उज्जैन में इस समय एक अजीबोगरीब और चिंताजनक प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया है। विश्व स्तर पर प्रसिद्ध ‘अखिल भारतीय कालिदास समारोह’ के आयोजन में अब महज गिनती के 20 दिन ही शेष बचे हैं, लेकिन जिस प्रमुख संस्था ‘कालिदास अकादमी’ को इसकी कमान संभालनी चाहिए, वहां पिछले एक महीने से न तो कोई नियमित निदेशक नियुक्त हो सका है और न ही किसी अधिकारी को प्रभार सौंपने का एक लाइन का आदेश जारी हुआ है।
अकादमी के बाहर लटका ताला और जिम्मेदार अधिकारियों का न होना किसी सस्पेंस फिल्म के दृश्य जैसा प्रतीत हो रहा है। स्थिति यह है कि कालिदास अकादमी के इतिहास में संभवतः ऐसा पहली बार हुआ है कि जब इतने लंबे समय तक निदेशक की कुर्सी पूरी तरह खाली रही हो।
राजशेखर व्यास की तीखी प्रतिक्रिया: “यह बेहद शर्मनाक”
अखिल भारतीय कालिदास समारोह के संस्थापक और प्रख्यात साहित्यकार पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास के पुत्र राजशेखर व्यास ने इस पूरी स्थिति पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने इसे अत्यंत शर्मनाक करार देते हुए कहा है कि इस तरह की लापरवाही से अकादमी के अस्तित्व पर ही गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
राजशेखर व्यास ने कहा: “जिस समारोह की ख्याति पूरी दुनिया में फैली हुई है, वहां इस तरह की प्रशासनिक शून्यता और अव्यवस्था देखकर सचमुच ग्लानि होती है। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि आयोजन से ठीक पहले इस तरह का असमंजस देखा गया हो।”
रिटायरमेंट के बाद भी कुर्सी का मोह? चर्चाओं में पूर्व निदेशक
मामले का एक और दिलचस्प और विवादास्पद पहलू यह है कि डॉ. गोविंद गंधे, जिन्होंने अपना तीन साल का कार्यकाल पूरा कर लिया था, गत 5 अक्टूबर को ही सेवानिवृत्त (Retire) हो चुके हैं। नियमतः रिटायरमेंट की तारीख के बाद कोई भी अधिकारी या व्यक्ति किसी भी सरकारी पद की आधिकारिक कुर्सी पर नहीं बैठ सकता।
बावजूद इसके, डॉ. गंधे लगातार रोजाना दफ्तर पहुंच रहे हैं और निदेशक की कुर्सी पर बैठकर जरूरी कामकाज भी निपटा रहे हैं। शहर के सांस्कृतिक प्रेमियों और गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि उन्हें अब भी कुर्सी से मोह छूट नहीं रहा है। हालांकि, यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी समारोह के सुचारू संचालन के लिए शायद उन्हें अनधिकृत रूप से या मौखिक सहमति पर काम करने की छूट दी गई हो, लेकिन संस्कृति विभाग द्वारा एक लाइन का आधिकारिक आदेश तक जारी न हो पाना इस बात का संकेत है कि पर्दे के पीछे कोई बड़ी खींचतान या ‘खिचड़ी’ पक रही है।
पूर्व प्रभारी निदेशक बोले: “दो महीने पहले शुरू हो जाती थी तैयारी”
अकादमी के पूर्व प्रभारी निदेशक डॉ. संतोष पंड्या ने मौजूदा प्रशासनिक सुस्ती पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि सामान्य तौर पर कालिदास समारोह जैसे वृहद राष्ट्रीय आयोजन की तैयारियां कम से कम दो महीने पहले से आरंभ कर दी जाती हैं। यदि समारोह में देश-विदेश से किसी बड़े सेलिब्रिटी या विशिष्ट अतिथि को आमंत्रित करना हो, तो प्लानिंग और मैनेजमेंट में काफी वक्त लगता है। ऐसे में, जब समारोह के शुभारंभ में केवल 20 दिन बचे हों और प्रशासनिक स्थिति शून्य हो, तो तय समय में उच्च स्तर की तैयारियां होना लगभग असंभव सा प्रतीत होता है।
आखिर किन कारणों से अटका है मामला?
राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इस देरी के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़ी वजहें चर्चा में हैं:
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आरएसएस का रुझान: चर्चा है कि डॉ. गोविंद गंधे का संघ (RSS) से जुड़ाव और सक्रियता रही है, जिसके चलते उन्हें पुनः प्रभार या सेवा विस्तार दिलाने के लिए वैचारिक स्तर पर प्रयास चल रहे हैं।
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संस्कृत के योग्य विद्वान की तलाश: संस्कृति विभाग किसी उच्च कोटि के योग्य संस्कृत विद्वान या शिक्षाविद् को इस प्रतिष्ठित पद पर बैठाने के विकल्प पर भी विचार कर रहा है।
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विलीन करने का प्रस्ताव: अकादमी को ‘विक्रमादित्य सिद्धपीठ’ में विलय (Merger) करने का एक प्रस्ताव भी विचाराधीन है, जिसके कारण नियुक्तियां अटकी हुई हैं।
संस्कृति संचालक का मोबाइल बंद, जिम्मेदार बेखबर
इस पूरे घटनाक्रम पर जब मीडिया और संस्कृति प्रेमियों ने शासन स्तर पर जवाब तलाशना चाहा, तो संस्कृति विभाग के संचालक पुरुषोत्तम नामदेव से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका आधिकारिक मोबाइल नंबर (9425150430) पर कोई जबाव नहीं मिला। प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की चुप्पी ने आग में घी का काम किया है।
21 नवंबर को है देवउठनी एकादशी और समारोह का शुभारंभ
आगामी 21 नवंबर को देवउठनी एकादशी के पावन पर्व पर ही अखिल भारतीय कालिदास समारोह का भव्य शुभारंभ होना है। यदि आने वाले कुछ दिनों में शासन स्तर पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो उज्जैन की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा से जुड़ा यह राष्ट्रीय आयोजन कुप्रबंध का शिकार हो सकता है। संस्कृति प्रेमियों और शहरवासियों की निगाहें अब मुख्यमंत्री कार्यालय और संस्कृति मंत्रालय पर टिकी हैं कि वे इस मामले में त्वरित हस्तक्षेप कर स्थिति स्पष्ट करें।


